एसआईआर प्रक्रिया में किसी को भी बाधा डालने की अनुमति नहीं दी जाएगी : उच्चतम न्यायालय
दिलीप
- 09 Feb 2026, 09:40 PM
- Updated: 09:40 PM
नयी दिल्ली, नौ फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को राज्यों को स्पष्ट कर दिया कि वह मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कवायद में किसी को भी बाधा डालने की अनुमति नहीं देगा।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि वह इस मामले में आवश्यक आदेश या स्पष्टीकरण जारी करेगी।
पीठ ने पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्वाचन आयोग के इन आरोपों के सिलसिले में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया कि कुछ शरारती तत्वों ने उसकी ओर से जारी नोटिस जला दिए हैं।
पीठ ने एसआईआर कवायद के लिए पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से निर्वाचन आयोग को ग्रुप-बी के 8,505 अधिकारियों की सूची उपलब्ध कराए जाने का संज्ञान लिया। उसने कहा कि इन अधिकारियों को एसआईआर प्रक्रिया में प्रशिक्षित और नियोजित किया जा सकता है।
पीठ ने प्रभावित व्यक्तियों की ओर से पेश दस्तावेजों की जांच के लिए समय सीमा 14 फरवरी से एक सप्ताह आगे बढ़ा दी। उसने कहा कि इस प्रक्रिया में कुछ समय लगने की संभावना है और समस सीमा बढ़ाने से मतदाता पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) को उचित फैसला लेने में मदद मिलेगी।
पीठ पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इनमें राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका भी शामिल है, जिसमें एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से "बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटाए जाने" की आशंका जाहिर की गई है।
पीठ ने कहा, "हम किसी को भी एसआईआर प्रक्रिया में बाधा डालने की अनुमति नहीं देंगे। राज्यों को यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए।"
निर्वाचन आयोग ने अपने अतिरिक्त हलफनामे में कहा कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर कवायद को पटरी से उतारने, पंगु बनाने और विफल करने के लिए जानबूझकर एवं सुनियोजित प्रयास किए जा रहे हैं।
पीठ ने विभिन्न निर्देश जारी करते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने निर्वाचन आयोग को ग्रुप-बी के जिन 8,505 अधिकारियों की सूची उपलब्ध कराई है, उन्हें एसआईआर प्रक्रिया में प्रशिक्षित और नियोजित किया जा सकता है।
उसने राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि ये 8,505 अधिकारी मंगलवार को शाम पांच बजे तक जिला निर्वाचन अधिकारी या ईआरओ के समक्ष ड्यूटी पर रिपोर्ट करें।
पीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग के पास मौजूदा ईआरओ या सहायक मतदाता पंजीकरण अधिकारी (एईआरओ) को बदलने और इन अधिकारियों की उपयुक्तता के आधार पर इनकी सेवाएं लेने का अधिकार होगा।
उसने कहा कि निर्वाचन आयोग इन 8,505 अधिकारियों के बायोडाटा और कार्य अनुभव की जांच करने के बाद इनमें से, पहले से ही कार्यरत सूक्ष्म-पर्यवेक्षकों की संख्या के बराबर अधिकारियों का चयन भी कर सकता है।
पीठ ने कहा कि इन अधिकारियों को ईआरओ या एईआरओ के साथ-साथ सूक्ष्म पर्यवेक्षकों की सहायता करने के उद्देश्य से एक या दो दिन का प्रशिक्षण दिया जाए।
उसने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में संशोधन के सिलसिले में अंतिम निर्णय हमेशा मतदाता सूची अधिकारियों द्वारा ही लिया जाएगा।
शीर्ष अदालत ने कहा कि इन 8,505 अधिकारियों की नियुक्ति का तरीका और कामकाज निर्वाचन आयोग द्वारा तय किया जाएगा।
पीठ ने निर्वाचन आयोग की ओर से दाखिल हलफनामे का संज्ञान लिया, जिसमें कुछ शरारती तत्वों पर हिंसा और उसके नोटिस जलाने का आरोप लगाया गया है।
आयोग ने हलफनामे में कहा कि जिन लोगों के नोटिस को जलाने और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल होने का संदेह है, उनके खिलाफ अभी तक कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है।
हालांकि, राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने निर्वाचन आयोग के दावे का खंडन किया।
इसके बाद पीठ ने पश्चिम बंगाल के डीजीपी को कारण बताओ नोटिस जारी कर हिंसा के संबंध में किए गए दावे पर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने निर्वाचन आयोग के हलफनामे का हवाला देते हुए कहा, "यह संदेश जाना चाहिए कि भारत का संविधान सभी राज्यों पर लागू होता है।"
एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि पश्चिम बंगाल में हिंसा की खबरें आई हैं और कुछ नेता लोगों को नोटिस जलाने के लिए उकसा रहे हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि उसने 19 जनवरी के अपने आदेश में पश्चिम बंगाल के डीजीपी, हर जिले के पुलिस अधीक्षकों (एसपी) और जिलाधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि एसआईआर सुनवाई स्थलों पर कानून-व्यवस्था की कोई समस्या न हो और पूरी गतिविधि सुचारु रूप से चले।
सुनवाई के दौरान ममता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने एसआईआर प्रक्रिया में सूक्ष्म पर्यवेक्षकों की नियुक्ति और बड़े पैमाने पर पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर आशंकाएं व्यक्त कीं।
दीवान ने पीठ से कहा, "हम नहीं चाहते कि मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर लोगों के नाम हटाए जाएं।"
उन्होंने प्रकाशित हो चुकी मसौदा मतदाता सूची की ओर इशारा किया और इसमें शामिल उन लोगों की संख्या का जिक्र किया, जिनके डेटा का मिलान किया जा चुका है और जिनका मिलान नहीं किया जा सका है।
दीवान ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने निर्वाचन आयोग को सूचित किया है कि वह एसआईआर कवायद के लिए राज्य या उसके संस्थानों के ग्रुप बी के 8,505 अधिकारियों को उपलब्ध कराने के लिए तैयार है।
हालांकि, आयोग के वकील ने कहा कि उन्हें किसी भी अधिकारी का नाम उपलब्ध नहीं कराया गया है।
दीवान ने कहा कि 8,505 अधिकारियों की सूची उनके विवरण सहित निर्वाचन आयोग को सौंप दी गई है।
पीठ ने पूछा, "क्या ये अधिकारी कल तक संबंधित ईआरओ के समक्ष रिपोर्ट कर सकते हैं?"
दीवान ने 'हां' में जवाब दिया।
पीठ ने कहा कि इन 8,505 अधिकारियों की सूची सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग की ओर से पेश हुए वकील को सौंप दी गई थी।
एक वकील ने शीर्ष न्यायालय में दायर उस अर्जी का हवाला दिया, जिसमें आरोप लगाया गया है कि एसआईआर मामले में चार फरवरी को ममता की शीर्ष अदालत में व्यक्तिगत उपस्थिति "संवैधानिक रूप से अनुचित" और "कानूनी रूप से अनुमत" नहीं थी।
जब वकील ने कहा कि किसी सेवारत मुख्यमंत्री का शीर्ष अदालत में पेश होना अभूतपूर्व है, तो प्रधान न्यायाधीश ने टिप्पणी की, "कृपया इस मुद्दे का राजनीतिकरण न करें।"
दलीलें सुनने के बाद पीठ ने एसआईआर की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने और उसके समक्ष व्यक्त की गई कुछ आशंकाओं को दूर करने के लिए कुछ अतिरिक्त निर्देश जारी किए।
निर्वाचन आयोग के वकील ने चार फरवरी को शीर्ष अदालत में दलील दी थी कि पश्चिम बंगाल सरकार ने एसआईआर प्रक्रिया की देखरेख के लिए ग्रेड टू के केवल 80 अधिकारियों की सेवाएं प्रदान की हैं।
ममता ने आयोग के आरोपों का खंडन करते हुए कहा था कि राज्य सरकार ने निर्वाचन आयोग की ओर से मांगी गई सभी सुविधाएं प्रदान की हैं।
ममता ने "लोकतंत्र को बचाने के लिए" शीर्ष अदालत से पश्चिम बंगाल में एसआईआर की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि राज्य को निशाना बनाया जा रहा है और उसके लोगों के अधिकारों को छीना जा रहा है।
भाषा पारुल दिलीप
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