न्यायालय का उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता के पिता की मौत मामले में सेंगर की याचिका पर सुनवाई से इनकार
पारुल
- 09 Feb 2026, 09:37 PM
- Updated: 09:37 PM
नयी दिल्ली, नौ फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को दिल्ली उच्च न्यायालय को उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत से जुड़े मामले में, भाजपा के निष्कासित नेता कुलदीप सिंह सेंगर की दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली याचिका पर निर्धारित तारीख से पहले सुनवाई करने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि इस पर तीन महीने के भीतर फैसला सुनाया जाना चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने उच्च न्यायालय के 19 जनवरी के आदेश को चुनौती देने वाली सेंगर की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।
पीठ ने कहा कि पीड़ित परिवार की ओर से दायर अपील, यदि कोई हो तो, उस पर भी सेंगर की याचिका के साथ उच्च न्यायालय द्वारा सुनवाई की जानी चाहिए।
पीठ सेंगर की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उक्त याचिका में उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें मामले में 10 साल की जेल की सजा को निलंबित करने से इनकार कर दिया गया था।
सुनवाई के दौरान, प्रधान न्यायाधीश ने पीड़ित के वकील के मामले के बारे में मीडिया में बयान देने को लेकर नाराजगी जताई।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ''हम किसी अलग-थलग जगह पर नहीं बैठे हैं। हम जानते हैं कि बाहर 'मीडिया ट्रायल' चल रहा है।'' उन्होंने कहा कि वह अदालत के बाहर किसी भी तरह की ''समानांतर सुनवाई'' को बर्दाश्त नहीं करेंगे।
पीठ को सूचित किया गया कि सेंगर की अपील पर उच्च न्यायालय में 11 फरवरी को सुनवाई होनी है।
सुनवाई के दौरान, सेंगर की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने कहा कि उनके मुवक्किल इस मामले में अपनी मूल सजा के सात साल और सात महीने पहले ही काट चुके हैं।
वहीं, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सेंगर की अपील उच्च न्यायालय में लंबित है और इसकी सुनवाई 11 फरवरी को होनी है। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय से इस मामले को अपने हाथ में लेने और अपील पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेने का अनुरोध किया जा सकता है।
पीठ ने टिप्पणी की कि सेंगर दुष्कर्म मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है।
न्यायालय ने कहा, ''यह एक ऐसा देश है, जिसे कानून के अपने शासन पर गर्व है। यहां तक कि सबसे दुर्दांत अपराधी को भी निष्पक्ष सुनवाई का मौका मिला है।''
मेहता ने 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों का जिक्र करते हुए कहा कि आतंकवादी अजमल कसाब को निष्पक्ष सुनवाई का मौका मिला था और उस मामले में न्यायिक कार्यवाही उच्चतम न्यायालय तक पहुंची थी।
निचली अदालत ने उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत से जुड़े मामले में 13 मार्च 2020 को सेंगर को 10 साल के कठोर कारावास और 10 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। अदालत ने कहा था कि परिवार की आजीविका चलाने वाले एकमात्र व्यक्ति की हत्या को लेकर किसी भी तरह की नरमी नहीं बरती जा सकती।
दुष्कर्म पीड़िता के पिता को सेंगर के इशारे पर शस्त्र अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था और पुलिस की बर्बरता के कारण नौ अप्रैल 2018 को हिरासत में उनकी मौत हो गई थी। सेंगर ने 2017 में नाबालिग का अपहरण कर उसके साथ दुष्कर्म किया था।
निचली अदालत ने पीड़िता के पिता की मौत के मामले में सेंगर को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत हत्या के आरोप में दोषी नहीं ठहराया था, बल्कि धारा 304 के तहत गैर-इरादतन हत्या के अपराध के लिए अधिकतम सजा सुनाई थी।
दुष्कर्म के मुख्य मामले में दिसंबर 2019 के फैसले के खिलाफ सेंगर की अपील उच्च न्यायालय में लंबित है। उक्त निर्णय में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी, साथ ही पीड़िता के पिता की मौत से जुड़े मामले में अपील उच्च न्यायालय में लंबित है।
उच्च न्यायालय ने 23 दिसंबर 2025 को सेंगर की सजा दुष्कर्म मामले में उसकी दोषसिद्धि और सजा को चुनौती देने वाली उसकी अपील के लंबित रहने तक निलंबित कर दी थी। वहीं, उच्चतम न्यायालय ने 29 दिसंबर को निलंबन पर रोक लगा दी थी।
भाषा सुभाष पारुल
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