संसाधनों के इस्तेमाल, संरक्षण की प्राचीन परंपराओं से सीखने की जरूरत: सुनीता नारायण
धीरज
- 07 Feb 2026, 07:18 PM
- Updated: 07:18 PM
नयी दिल्ली, सात फरवरी (भाषा) प्रख्यात पर्यावरणविद सुनीता नारायण का कहना है कि समकालीन पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए जल संचयन, खाद्य विविधता और कृषि की प्राचीन भारतीय परंपराओं से सीख लेने की जरूरत है।
'भारत पर्यावास केंद्र' में शुक्रवार को आयोजित 'आईएचसी समन्वय' में अपने संबोधन में नारायण ने भारत की पारिस्थितिक परंपराओं, संयम, प्रकृति के प्रति श्रद्धा और विकास के साथ आने वाली नैतिक जिम्मेदारियों के बारे में विस्तार से बात की।
उन्होंने कहा, "आज के इस बेहद चुनौतीपूर्ण दौर में विकास के प्रति हमारे रुख पर पुनर्विचार करना इतना अहम क्यों है? ज्ञान के बारे में हम क्या जानते हैं, हम आगे बढ़ने के तरीकों के बारे में क्या जानते हैं और हम अपनी असाधारण परंपराओं से कैसे सीख सकते हैं, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें उन सिद्धांतों से सीखना होगा, जिन्होंने इन परंपराओं को गति प्रदान की।"
नारायण ने कहा कि आज प्राचीन परंपराओं को "यमुना नदी में डुबकी लगाने या दिवाली पर पटाखे फोड़ने जैसे खोखले अनुष्ठानों" के जरिये रोमांटिक रूप दिया जा रहा है।
उन्होंने कहा, "जब हम झाग और प्रदूषण से भरी यमुना नदी में डुबकी लगाते हैं, तो हम इसे अपने धर्म और संस्कृति का हिस्सा कहते हैं, तो क्या वास्तव में यमुना नदी साफ है। यह साफ नहीं है, यह गंदी है और इसे साफ करने की जरूरत है और यह हमारी पारंपरिक भाषा का हिस्सा होना चाहिए।"
नारायण ने कहा, "जब हम ऐसे समय में आतिशबाजी के अधिकार की बात करते हैं, जब दिल्ली में सांस लेना भी मुश्किल हो रहा है, तो यह संस्कृति का अधिकार नहीं है। यह संस्कृति नहीं है। जिस संस्कृति में हम सब जीते हैं, वह एक जीवंत संस्कृति है। यह एक विकसित होती हुई संस्कृति है, जो मानवता और तर्कसंगतता के सिद्धांत से विकसित हो रही है।"
नारायण ने भारत में विभिन्न समुदायों की ओर से जल संचयन के लिए सदियों से अपनाए जा रहे विभिन्न तरीकों का जिक्र किया। इनमें राजस्थान में टंका और अगोर से लेकर लद्दाख में जिंग तथा पूर्वोत्तर की बांस सिंचाई तकनीक शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि इन "उल्लेखनीय जल संचयन परंपराओं" का ज्ञान तब लुप्त हो गया, जब अंग्रेज भारत आए और जल प्रबंधन के नये तरीके पेश किए।
नारायण ने कहा, "हम उन विकेंद्रीकृत, सामुदायिक स्वामित्व वाली जल प्रबंधन प्रणालियों से हटकर एक ऐसी प्रणाली में आ गए, जिसका नियंत्रण लोक निर्माण विभाग के हाथ में था। वे जलाशयों से पानी निकालते थे और लंबी दूरी से पानी लाकर हमारे नलों में आपूर्ति करते थे और हमें लगा कि यही आधुनिक जीवन है।"
उन्होंने कहा कि संसाधनों और पूंजी पर निर्भर जल प्रबंधन प्रणालियों के कारण ही यमुना नदी में प्रदूषण जैसी घटनाएं सामने आई हैं।
नारायण ने कहा कि दूर से पानी लाने और घर के पास के जल स्रोतों को प्रदूषित करने के कारण जल परिवहन, बिजली और पानी की लागत लगातार बढ़ती जा रही है।
उन्होंने कहा, "...और जैसे-जैसे पानी की कीमत बढ़ती जा रही है, नगरपालिकाओं के पास सीवेज संग्रहण पर खर्च करने के लिए पैसा नहीं बच रहा है। इसलिए आज सीवेज उसी भूजल को प्रदूषित कर रहा है, जिसकी हमें जल सुरक्षा के लिए आवश्यकता है।"
भाषा पारुल धीरज
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0702 1918 दिल्ली