कर्मचारियों को 2008 से 2019 तक के डीए का भुगतान करने का न्यायालय का ममता सरकार को निर्देश
नरेश
- 05 Feb 2026, 08:01 PM
- Updated: 08:01 PM
नयी दिल्ली, पांच फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल के लगभग 20 लाख सरकारी कर्मचारियों को बृहस्पतिवार को राहत देते हुए राज्य सरकार को 2008 से 2019 तक का महंगाई भत्ता देने का निर्देश दिया।
न्यायालय ने यह निर्देश इस बात पर गौर करते हुए दिया कि महंगाई भत्ता देना वैध अधिकार है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार को छह मार्च तक अपने कर्मचारियों को बकाया महंगाई भत्ते (डीए) का 25 प्रतिशत भुगतान करने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा कि एक बार वैधानिक नियमों के अनुसार अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (एआईसीपीआई) से जोड़कर महंगाई भत्ता को परिभाषित कर दिया जाए, तो राज्य बाद के कार्यालय ज्ञापनों के माध्यम से इसकी गणना करने के तरीके को संशोधित नहीं कर सकता है।
पीठ ने कहा, ''महंगाई भत्ता प्राप्त करना पश्चिम बंगाल राज्य के प्रतिवादी-कर्मचारियों के पक्ष में कानूनी रूप से लागू होने योग्य अधिकार है... अपीलकर्ता-राज्य के कर्मचारी इस निर्णय के अनुसार वर्ष 2008-2019 की अवधि के लिए बकाया राशि के हकदार होंगे।''
इसने साथ ही कहा कि कर्मचारियों को साल में दो बार महंगाई भत्ता पाने का अधिकार नहीं है।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि महंगाई भत्ता राज्य में अपने कर्मचारियों को बढ़ती कीमतों के प्रतिकूल प्रभावों से बचाता है।
इसने कहा कि महंगाई भत्ता कोई अतिरिक्त लाभ नहीं है, बल्कि जीवन स्तर बनाये रखने का एक तरीका है।
इसने शामिल वित्तीय निहितार्थों को ध्यान में रखते हुए, इसने एक समिति का भी गठन किया जिसमें उच्चतम न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा, उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश/न्यायाधीश - न्यायमूर्ति तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति गौतम भादुरी और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक या उनके द्वारा नामित उनके विभाग के सबसे वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे।
अदालत ने समिति को राज्य अधिकारियों के परामर्श से भुगतान की जाने वाली कुल राशि और भुगतान की अनुसूची निर्धारित करने और समय-समय पर राशि को जारी किये जाने को सत्यापित करने का निर्देश दिया।
न्यायालय ने कहा कि समिति के निर्णय के अधीन, पहली किस्त का भुगतान 31 मार्च, 2026 तक किया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा, ''यह स्पष्ट किया जाता है कि राज्य के वे कर्मचारी जो इस मुकदमे के लंबित रहने के दौरान सेवानिवृत्त हुए हैं, वे भी इसके अनुसार लाभों के हकदार होंगे।''
इसने राज्य सरकार को पहली किस्त के भुगतान के बाद वस्तु स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया और अनुपालन के लिए मामले को 15 अप्रैल के लिए सूचीबद्ध किया।
पीठ ने कहा कि महंगाई भत्ता की अवधारणा मुद्रास्फीति की समस्या और वेतन पर इसके प्रभाव का एक विशिष्ट भारतीय तरीका है, जिसे बढ़ती कीमतों के कारण कर्मचारियों की वास्तविक आय में लगातार हो रही गिरावट से बचाने के लिए तैयार किया गया है।
अदालत ने इस सवाल पर फैसला करने से इनकार कर दिया कि क्या महंगाई भत्ता संविधान के अनुच्छेद 21 का एक पहलू है और इसे मौलिक अधिकार माना जाना चाहिए।
वकीलों के अनुसार, कुल बकाया महंगाई भत्ता लगभग 41,000 करोड़ रुपये है।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब पश्चिम बंगाल सरकार के कर्मचारियों के एक वर्ग ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर केंद्र सरकार के अपने समकक्षों के समान दर पर महंगाई भत्ता और लंबित बकाया राशि दिये जाने का अनुरोध किया।
उच्च न्यायालय ने मई 2022 में कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया था और राज्य को महंगाई भत्ते को केंद्रीय दरों के अनुरूप करने का निर्देश दिया था।
पश्चिम बंगाल सरकार ने हालांकि नवंबर 2022 में उच्चतम न्यायालय में अपील दायर करके उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी थी।
अप्रैल 2025 तक, जहां केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 55 प्रतिशत महंगाई भत्ता मिलता है, वहीं पश्चिम बंगाल के कर्मचारियों को हाल में चार प्रतिशत की बढ़ोतरी के बावजूद केवल 18 प्रतिशत ही मिलता है।
भाषा
देवेंद्र नरेश
नरेश
0502 2001 दिल्ली