बंगाल में 'गंभीरा' नर्तक बदलती परिस्थितियों में स्वदेशी कला को बचाए रखने के लिए जूझ रहे
नरेश
- 25 Jan 2026, 05:44 PM
- Updated: 05:44 PM
(सुप्रतीक सेनगुप्ता)
कोलकाता, 25 जनवरी (भाषा) पश्चिम बंगाल में दक्षिण दिनाजपुर जिले के खगैल गांव में रहने वाले 57 वर्षीय माधव सरकार युवाओं की घटती भागीदारी और सोशल मीडिया रीलों की बढ़ती लोकप्रियता जैसी चुनौतियों के बीच 'गंभीरा' नृत्य को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह मुखौटा नृत्य एक लोक कला है जो रीति-रिवाजों और कहानी के जरिये प्रस्तुत किये जाने पर आधारित है।
क्षेत्र में लगभग 20 सदस्यों वाले गंभीरा नृत्य मंडली का नेतृत्व करने वाले सरकार ने 'पीटीआई-भाषा' को बताया कि वे दशकों से इस कला का अभ्यास कर रहे हैं, लेकिन बदलते हालात ने उन्हें और समूह के अन्य सदस्यों को चिंतित कर दिया है।
उन्होंने कहा, ''मैंने नृत्य के चरण, मुद्रा और बारीकियां अपने पिता से सीखी थीं, जिन्हें मेरे दादाजी ने ये कौशल सिखाए थे। यह हमारे खून में है। मेरे बेटे को भी गंभीरा नर्तक बनने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। लेकिन दूसरों के लिए स्थिति अलग है। मेरे साथी अक्सर मुझसे कहते हैं कि उनके बच्चे अब इस कला का अभ्यास करने में रुचि नहीं रखते।''
सरकार ने कहा कि उन्हें मई से जुलाई तक के सीजन के दौरान कम से कम 10 बुकिंग मिलती थीं, लेकिन हाल के वर्षों में यह संख्या घटकर चार-पांच तक सीमित हो गई है।
गंभीरा एक पारंपरिक मुखौटा नृत्य है जिसमें बुरा-बुरी (भगवान शिव और देवी पार्वती का प्रतिनिधित्व), देवी काली और विष्णु के नरसिंह अवतार जैसे पात्र शामिल होते हैं। पारंपरिक ढोल की थाप के साथ किया जाने वाला यह नृत्य बिना गायन के प्रस्तुत किया जाता है।
उन्होंने बताया कि लकड़ी का मुखौटा, जिसे 2018 में भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग प्राप्त हुआ था, इस कला को संरक्षित करने में सहायक है।
सरकार ने कहा, ''हम मुखौटे बनाने में प्रयुक्त डिजाइन और सामग्री से कभी समझौता नहीं करते, और यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।''
उन्होंने बताया कि कुशमंडी प्रखंड में लगभग 100 'गंभीरा' नर्तक विभिन्न मंडलियों में विभाजित होकर इस नृत्य शैली को आगे बढ़ा रहे हैं।
उन्होंने कहा, ''एक पूरी कहानी को प्रस्तुत करने के लिए हमें एक प्रस्तुति में 16-20 सदस्यों की आवश्यकता होती है। लेकिन लोगों की एकाग्रता अवधि के घट जाने के कारण, हमें इसे संक्षिप्त और छोटे प्रारूप में तैयार करना पड़ता है।''
सरकार ने कहा कि कलाकार इस बात के लिए प्रतिबद्ध हैं कि 'आने वाले दिनों में स्वदेशी संस्कृति विलुप्त न होने दी जाए'।
भाषा संतोष नरेश
नरेश
2501 1744 कोलकाता