निर्वाचन आयोग संदिग्ध पड़ोसी या पुलिसकर्मी की भूमिका नहीं निभा सकता, न्यायालय को बताया गया
प्रशांत रंजन
- 11 Dec 2025, 10:14 PM
- Updated: 10:14 PM
नयी दिल्ली, 11 दिसंबर (भाषा) विभिन्न राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह पर अंतिम सुनवाई के दौरान बृहस्पतिवार को सर्वोच्च न्यायालय को बताया गया कि निर्वाचन आयोग “संदिग्ध पड़ोसी” या “पुलिसकर्मी” की भूमिका नहीं निभा सकता जो मतदाताओं के साथ संदेहपूर्ण व्यवहार करे।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कई राज्यों में जारी एसआईआर प्रक्रिया का विरोध कर रहे याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन द्वारा प्रस्तुत विस्तृत दलीलों को सुना।
रामचंद्रन ने एसआईआर की वैचारिक नींव पर निशाना साधा और जोर देकर कहा कि निर्वाचन आयोग का संवैधानिक जनादेश मतदान अधिकारों के सूत्रधार और प्रवर्तक के रूप में कार्य करना है।
रामचंद्रन ने कहा, “किसी की अपनी भूमिका को नकारात्मक तरीके से देखने का मतलब है खुद को अवरोधक या संदेहपूर्ण पुलिस वाले के रूप में देखना।” उन्होंने कहा कि जब नागरिकता के संबंध में पर्याप्त वैधानिक प्रावधान मौजूद हों, तो निर्वाचन आयोग “जिज्ञासु” बनकर बूथ स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) को मतदाताओं पर संदेह करने का निर्देश नहीं दे सकता।
उन्होंने कहा कि बीएलओ के संदेह के आधार पर जांच शुरू करना प्रभावी रूप से “नागरिकता निलंबित करने” के बराबर है।
उन्होंने कहा, “अब, निर्वाचन आयोग अपनी भूमिका को किस तरह देखता है? क्योंकि उसकी भूमिका के प्रति उसका नजरिया ही उसके कार्यों को निर्धारित करेगा। या तो वह अपनी भूमिका को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के सामाजिक आदर्श के सूत्रधार और समर्थक के रूप में देखता है, जिसका अर्थ होगा नागरिकों को मतदान करने में मदद करना, सक्रिय रूप से सहायता करना और सक्षम बनाना।”
रामचंद्रन ने कहा, “अपनी भूमिका को नकारात्मक रूप से देखने का मतलब है किसी बाधा डालने वाले व्यक्ति, किसी संदिग्ध पुलिसकर्मी या किसी संदिग्ध पड़ोसी की भूमिका निभाना। इसलिए, आप अपनी भूमिका को किस तरह देखते हैं, उसी के आधार पर आपकी निष्पक्षता की भावना और किसी विशेष कार्य को करने का आपका तरीका स्पष्ट होगा।”
उन्होंने तर्क दिया कि यद्यपि मतदान का अधिकार वैधानिक हो सकता है, यह अनुच्छेद 19(1)(ए) और अनुच्छेद 21 सहित संवैधानिक अधिकारों से प्राप्त होता है।
उन्होंने कहा, “संदेह के आधार पर मतदाता सूची से नाम हटाना नागरिकता निलंबित करने की शक्ति देने के बराबर है।”
“प्रवासी” शब्द की परिभाषा और निहितार्थ पर उन्होंने कहा कि वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में, इस शब्द का प्रयोग अक्सर घरेलू आवागमन के बजाय “अवैध प्रवासी” या “पलायन” के अर्थ में किया जाता है।
व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “प्रवासन का कोई घरेलू कारण नहीं है... बल्कि यह उनकी आजीविका है जो उन्हें प्रेरित करती है। हमारे यहां प्रतिभा पलायन हो रहा है, जो एक प्रकार का प्रवासन ही है।”
याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर प्रक्रिया की मनमानी प्रकृति के खिलाफ तर्क दिया, जबकि पीठ ने कहा, “एसआईआर को प्रक्रियात्मक पहलुओं के आधार पर बहुत अधिक नहीं देखा जा सकता। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि वे 20 वर्षों के बाद कुछ कर रहे हैं और एसआईआर वार्षिक प्रक्रिया नहीं बन सकती। इसीलिए हम तकनीकी प्रक्रियात्मक पहलुओं में बहुत अधिक हस्तक्षेप नहीं कर सकते।”
सुनवाई की शुरुआत में, प्रधान न्यायाधीश ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस मामले में कोई और नयी याचिका स्वीकार न की जाए।
उन्होंने कहा, “कई लोग अब सिर्फ प्रचार के लिए याचिका दायर कर रहे हैं। अब किसी नए मामले की आवश्यकता नहीं है।”
मामले की सुनवाई 16 दिसंबर को जारी रहेगी।
इससे पहले, पीठ ने पूछा था कि क्या निर्वाचन आयोग किसी संदिग्ध नागरिक के मामले में जांच करने से प्रतिबंधित है और क्या पूछताछ की प्रक्रिया उसकी संवैधानिक शक्ति के दायरे से बाहर है।
भाषा प्रशांत