प्रदर्शनकारी मस्तिष्काघात के शिकार बीएलओ को लेकर बंगाल सीईओ कार्यालय पहुंचे
नोमान पारुल
- 09 Dec 2025, 10:14 PM
- Updated: 10:14 PM
कोलकाता, नौ दिसंबर (भाषा) पश्चिम बंगाल के बूथ स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) के एक संगठन ने मंगलवार को यहां मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय के बाहर विरोध-प्रदर्शन किया, जिस दौरान मस्तिष्काघात के शिकार एक बीएलओ को एम्बुलेंस में लाया गया।
प्रदर्शनकारियों का दावा है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से संबंधित ड्यूटी के दौरान अत्यधिक तनाव के कारण वह मस्तिष्काघात का शिकार हो गया।
दक्षिण 24 परगना जिले के फ्रेजरगंज ग्राम पंचायत के बूथ 276 के बीएलओ देबाशीष दास (57) को करीब 10 दिन पहले मस्तिष्काघात हुआ था और वह सरकारी एसएसकेएम अस्पताल में भर्ती थे।
उन्हें आज अस्पताल से छुट्टी दी गई।
दास के परिवार के सदस्य और सहकर्मी उन्हें एम्बुलेंस से सीईओ कार्यालय ले आए।
बीएलओ अधिकार रक्षा समिति के सदस्यों ने सीईओ कार्यालय के सामने धरना दिया और एम्बुलेंस को पास में ही खड़ा कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग ने न तो कोई मुआवजा दिया और न ही अधिकारी की हालत के बारे में पूछा।
दास के परिवार ने दावा किया कि एसआईआर ड्यूटी से जुड़े अचानक और तीव्र कार्य दबाव के कारण चिकित्सा आपातकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई थी।
उनके बेटे सौरव दास ने संवाददाताओं से कहा, "काम के तनाव के कारण मेरे पिता बेहोश हो गए। आयोग से किसी ने भी उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछने के लिए हमसे एक बार भी संपर्क नहीं किया। हमने एक प्रतिनिधिमंडल भेजा और बीएलओ के लिए बीमा योजना के तहत मुआवजे की मांग की। हम मुआवजे के तौर पर 15 लाख रुपये की मांग कर रहे हैं।"
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि चार दिसंबर को एसआईआर कवायद शुरू होने के बाद से राज्य भर के बीएलओ "जबरदस्त मानसिक और शारीरिक दबाव" में हैं, और कई लोग काम के बोझ के कारण प्रशिक्षण कार्यक्रमों के दौरान ही रोने लग जाते हैं।
उन्होंने पुनरीक्षण प्रक्रिया शुरू होने के बाद से विभिन्न जिलों में हुई कई मौतों का भी हवाला दिया।
एक प्रदर्शनकारी बीएलओ ने आंदोलन स्थल पर कहा, "हम चाहते हैं कि देबाशीष दास पूरी तरह से ठीक हो जाएं। साथ ही, हम इस बोझिल काम के दबाव से तुरंत राहत की मांग करते हैं। आयोग लगातार निर्देश जारी कर रहा है, लेकिन हमारा बोझ कम नहीं हो रहा है।"
प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाया कि निर्वाचन आयोग ने कोई मुआवजा क्यों नहीं घोषित किया है, जबकि राज्य सरकार चुनाव ड्यूटी के दौरान घायल होने या मरने वाले मतदान कर्मियों को अनुग्रह राशि प्रदान करती है।
एक प्रदर्शनकारी ने पूछा, "राज्य सरकार चुनाव ड्यूटी के दौरान होने वाली मौतों के लिए मुआवजा देती है। निर्वाचन आयोग उन बीएलओ को बुनियादी सहायता देने से भी क्यों इनकार कर रहा है, जो अनिवार्य ड्यूटी के दौरान बीमार पड़ जाते हैं?"
भाषा नोमान