पीएसयू, निजी कंपनियों के संचालकों की डरते हुए निर्णय लेने से नीतिगत पंगुता आती है: न्यायालय
वैभव माधव
- 04 Nov 2025, 08:27 PM
- Updated: 08:27 PM
नयी दिल्ली, चार नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि अगर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी क्षेत्र की कंपनियों के संचालक इस ‘डर’ से घिरे रहेंगे कि उनके फैसलों को बाद में नकारात्मक तरीके से देखा जाएगा और उन्हें और उनकी कंपनियों को मुकदमेबाजी में उलझाया जाएगा, तो बड़े हिचकिचाते हुए काम करने की प्रवृत्ति पैदा होती है और इससे नीतिगत पंगुता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
ये टिप्पणियां शीर्ष अदालत द्वारा सोमवार को दिए गए एक फैसले में की गईं, जिसमें एंग्लो अमेरिकन मेटलर्जिकल कोल प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में 7.872 करोड़ अमेरिकी डॉलर (लगभग 650 करोड़ रुपये) की मध्यस्थता राशि के प्रवर्तन को बरकरार रखा गया, और सरकारी कंपनी एमएमटीसी लिमिटेड की चुनौती को खारिज कर दिया गया। कहा गया कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी अपने वरिष्ठ प्रबंधन द्वारा उल्लंघन का प्रथम दृष्टया मामला भी स्थापित करने में विफल रही।
न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने 2025 के दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ एमएमटीसी की अपील पर फैसला सुनाया, जिसमें नागरिक प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 47 के तहत उसकी आपत्तियों को खारिज कर दिया गया था और एंग्लो अमेरिकन कोल प्राइवेट लिमिटेड को जमा की गई राशि ब्याज सहित निकालने की अनुमति दी गई थी।
न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने पीठ के लिए 82 पृष्ठों का निर्णय लिखते हुए उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा और एमएमटीसी की याचिका को खारिज करते हुए संज्ञान लिया कि निर्णय के प्रवर्तन में हस्तक्षेप करने का ‘कोई ठोस आधार’ नहीं है।
फैसले के अनुसार, ‘‘चाहे सरकार हो, सार्वजनिक क्षेत्र के निगम हों या निजी क्षेत्र, किसी भी संस्था की प्रेरक शक्ति वे लोग होते हैं जो उसका प्रशासन देखते हैं। उनके दैनिक कामकाज में कुछ न कुछ व्यवधान अवश्यंभावी है।’’
इसमें कहा गया, ‘‘अगर वे इस डर से घिर जाएं कि उनके दैनिक प्रशासन के लिए गए निर्णयों को, वर्षों बाद, पीछे मुड़कर देखने पर, नकारात्मक दृष्टि से देखा जा सकता है, तो यह उन पर एक भयावह प्रभाव डालेगा।’’
निर्णय के अनुसार, ‘‘बहुत संकोच के साथ फैसले करने की प्रवृत्ति विकसित होगी। निर्णय लेने से बचा जाएगा। नीतिगत पंगुता की स्थिति होगी।’’
इसमें कहा गया कि यह सब आगे चलकर न केवल उस संस्था के लिए, बल्कि राष्ट्र के लिए भी हानिकारक साबित होगा।
भाषा वैभव