सिंधु जल संधि: ज़िम्मेदारियों का असमान वितरण, असमान रियायत और पाकिस्तान द्वारा दुरुपयोग
नरेश
- 05 May 2026, 03:01 PM
- Updated: 03:01 PM
(निम्नलिखित आलेख सिंधु जल पर पूर्व भारतीय आयुक्त प्रदीप कुमार सक्सेना द्वारा लिखे गए दो लेखों में से पहला लेख है)
असमान संरचना — भारत की सद्भावना किस प्रकार दूसरे पक्ष के लिए औपचारिक रूप से रियायत में रूपांतरित कर दी गई
1. पृष्ठभूमि: नदी प्रणाली का विभाजन
सिंधु नदी प्रणाली में छह प्रमुख नदियां शामिल हैं—सिंधु, चिनाब, झेलम, रावी, ब्यास और सतलुज, जो भारत और पाकिस्तान दोनों के क्षेत्रों से होकर बहती हैं। यह प्रणाली सिंधु बेसिन में पेयजल, कृषि और बिजली के उत्पादन को बनाए रखती है जो कि सीमा के दोनों ओर करोड़ों लोगों के जीवनयापन का आधार है।
जब 1947 में ब्रिटिश भारत का विभाजन हुआ तो सिंधु नदी प्रणाली को भी दोनों उत्तराधिकारी देशों के बीच विभाजित कर दिया गया।
भौगोलिक वास्तविकता बिल्कुल विपरीत थी: भारत के ऊपरी तटवर्ती क्षेत्र में स्थित होने के नाते यहां अधिकांश नदियों के उद्गम स्थल हैं, जबकि पाकिस्तान का कृषि प्रधान क्षेत्र जिसमें अत्यधिक सिंचित पंजाब के मैदानी क्षेत्र हैं, पूर्व से आने वाले निरंतर जल प्रवाह पर अत्यधिक निर्भर थे।
भारत को पंजाब और राजस्थान में अपने विकास उद्देश्यों के लिए इस प्रणाली तक पहुंच की आवश्यकता थी। साथ ही वह अपने नए पश्चिमी पड़ोसी के साथ स्थिरता और सामान्य संबंध स्थापित करना चाहता था।
अपनी स्वयं की अत्यंत आवश्यक घरेलू ज़रूरतों के बावजूद, भारत ने 19 सितंबर 1960 को पाकिस्तान के साथ जल-बंटवारे का यह अत्यधिक रियायती समझौता किया जो कि विश्व बैंक की मदद से किया गया था।
2. समझौता– भारत ने चुकायी तर्कसंगतता की कीमत
2.1) पाकिस्तान की विलंब की रणनीति और 1954 का विश्व बैंक प्रस्ताव:
समझौते की शुरुआत ही असमानता से हुई क्योंकि जहां भारत ने तर्कसंगत और रचनात्मक रुख अपनाया, वहीं पाकिस्तान ने न केवल अतिवादी, बल्कि कभी-कभी बेतुकी मांगें भी पेश कीं। इस असमानता की वजह से इस समझौते ने न्यायसंगत होने के बजाय पाकिस्तान के लिए अधिक अनुकूल परिणाम सुनिश्चित किए।
विश्व बैंक का 5 फरवरी 1954 का पहला ठोस प्रस्ताव इसे स्पष्ट रूप से दर्शाता है: इस शुरुआती चरण में भी, इसके लिए भारत की ओर से काफ़ी एकतरफ़ा रियायतों की ज़रूरत थी:
• सिंधु और चिनाब, दोनों नदियों के ऊपरी हिस्सों में भारत की सभी नियोजित विकास परियोजनाओं को छोड़ दिया जाना था और उनसे मिलने वाले लाभ इसके बजाय पाकिस्तान को प्राप्त होने थे।।
• भारत को चिनाब नदी से लगभग 6 मिलियन एकड़-फुट पानी मोड़ने के अधिकार का परित्याग करना था।
• मेराला (अब पाकिस्तान में स्थित) में चिनाब नदी का जल भारतीय उपयोग के लिए उपलब्ध नहीं होने की बात थी।
• कच्छ में नदी प्रणाली से किसी भी प्रकार के जल विकास की अनुमति नहीं दी जाएगी।
इन भारी प्रतिबंधों के बावजूद, भारत ने तुरंत ही सद्भावनापूर्वक तरीके से प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इससे प्रतीत होता है कि भारत कोई विलंब किए बिना यथाशीघ्र इस मुद्दे पर समाधान चाहता था।
इसके ठीक विपरीत पाकिस्तान ने लगभग पांच वर्षों तक, 22 दिसंबर 1958 तक, औपचारिक स्वीकृति में देरी की।
भारत के इस सद्भावनापूर्ण कदम के बावजूद, उस पर ही प्रतिबंध लगाए गए जबकि पाकिस्तान बिना किसी ऐसे समान प्रतिबंध के पश्चिमी नदियों पर नई परियोजनाएं विकसित करता रहा।
इससे पाकिस्तान ने यह सीखा कि रुकावट पैदा करने से फायदा होता है और सहयोग करने से खुद का घाटा होता है। और तभी से पाकिस्तान लगातार अपनी इसी विचारधारा का पालन कर रहा है।
3. भारत ने क्या खोया: बलिदान का पैमाना।
3.1) जल आवंटन
संधि के आवंटन सूत्र के तहत, भारत को तीन पूर्वी नदियों - सतलुज, ब्यास और रावी पर विशेष अधिकार प्राप्त हुए जबकि पाकिस्तान को पश्चिमी तीन नदियों - सिंधु, चिनाब और झेलम के जल पर अधिकार दिए गए।
भारत को अनुमति दी गई कि वह अपने क्षेत्र में स्थित पश्चिमी नदियों का उपयोग कर सकता है लेकिन केवल सीमित तौर पर। इसके अलावा, भारत को मुख्य रूप से जलविद्युत परियोजनाओं के लिए इस पानी का उपयोग करना था, लेकिन यह अनुमति व्यापक डिज़ाइन और परिचालन संबंधी प्रतिबंधों के अधीन थी।
आयतन के हिसाब से देखें तो, भारत को आवंटित पूर्वी नदियों में लगभग 33 मिलियन एकड़-फुट (एमएएफ) वार्षिक जल प्रवाह होता है, जबकि पाकिस्तान को आवंटित पश्चिमी नदियों में लगभग 135 मिलियन एकड़-फुट जल प्रवाह है, जिससे कि पाकिस्तान को इस जल प्रणाली का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त हुआ। भारत को 20 प्रतिशत हिस्सा मिला जिसके बदले में उसने कहीं अधिक विशाल पश्चिमी जल प्रणाली पर अपना सारा दावा छोड़ दिया।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भारत को समझौते से अतिरिक्त पानी प्राप्त नहीं हुआ। भारत को केवल उन जल प्रवाहों की औपचारिक स्वीकृति मिली जिन तक उसकी पहले से ही पहुंच थी। लेकिन इसके बदले में उसने कहीं अधिक विशाल पश्चिमी जल प्रणाली पर अपना सारा दावा छोड़ दिया।
भारत को अनुमति दी गई कि वह अपने क्षेत्र में स्थित पश्चिमी नदियों के पानी का उपयोग केवल विशेष कार्य के लिए ही कर सकता है, मुख्य रूप से बिजली बनाने के लिए इस पानी का उपयोग कर सकता है, वह भी नदी के प्राकृतिक प्रवाह से।
3.2) वित्तीय रियायत: भारत ने पानी साझा करने की कीमत चुकाई
संधि की सबसे उल्लेखनीय विसंगति शायद इसका वित्तीय प्रावधान है। भारत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में जल संसाधन अवसंरचना के निर्माण के लिए पाकिस्तान को मुआवज़े के तौर पर लगभग 62 मिलियन पाउंड (वर्तमान मूल्य में लगभग 2.5 अरब अमेरिकी डॉलर) का भुगतान करने पर सहमति जताई।
यह भुगतान एक अनूठी मिसाल पेश करता है जिसमें जल प्रणाली के अधिकांश जल को पहले ही त्यागने वाला ऊपरी देश, निचले देश को ऐसा करने के "विशेषाधिकार" के लिए अतिरिक्त भुगतान करता है।
भारत ने एक तरह से पाकिस्तान को उस समझौते को स्वीकार करने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जो कि जल आवंटन के मूल प्रश्न पर पाकिस्तान के पक्ष में अत्यधिक झुका हुआ था।
4. संधि की संरचनात्मक असमानता
4.1) भारत पर एकतरफा असमान प्रतिबंध: इस संधि के तहत भारत द्वारा पश्चिमी नदियों के उपयोग पर कई विशिष्ट डिज़ाइन और संचालन संबंधी प्रतिबंध लगाए गए जिनका पाकिस्तान पर कोई समान दायित्व नहीं है:
• भारत अपने भूभाग में सीमित सिंचित फसल क्षेत्र (आईसीए) का ही विकास कर सकता है।
• भारत को पश्चिमी नदियों पर किसी भी जलविद्युत परियोजना के लिए विशिष्ट डिज़ाइन मानदंडों का पालन करना होगा जिसमें तालाब और भंडारण क्षमता पर लगाई गई पाबंदियाँ भी शामिल हैं।
ये प्रतिबंध एकतरफा हैं: ये भारत को अपने क्षेत्र के भीतर संसाधनों के वैध विकास से रोकते हैं, जबकि पाकिस्तान पर इस संबंध में कोई समान पारदर्शिता या प्रतिबंध संबंधी आवश्यकताएं लागू नहीं करते। इस संधि के परिणामस्वरूप जो देश ऊपरी धारा पर स्थित है यानी कि भारत उसे न केवल सीमाओं और कड़े नियमों का पालन करना पड़ रहा है, बल्कि जो देश निचली धारा पर स्थित है यानी कि पाकिस्तान उसे किसी भी चीज़ का पालन किए बिना जल की सुनिश्चित और सुगम आपूर्ति हो रही है।
* लेखक : प्रदीप कुमार सक्सेना (सिंधु जल के लिए पूर्व भारतीय आयुक्त)
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