विश्व का सबसे बड़ा जलवायु खतरा जो दिखता नहीं
नरेश
- 18 Jun 2026, 04:07 PM
- Updated: 04:07 PM
(फियोना थॉमसन, डरहम विश्वविद्यालय)
डरहम (ब्रिटेन), 18 जून (द कन्वरसेशन) अटलांटिक महासागर की गहराइयों में पानी का एक विशाल प्रवाह उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से गर्मी को ग्रीनलैंड की ओर ले जाता है। इसे 'अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन' (एएमओसी) कहा जाता है। यह पूरी प्रक्रिया अधिकांशतः हमारी नजरों से दूर होती है, इसलिए वर्षावनों, ध्रुवीय हिम आवरण या जलवायु को नियंत्रित करने वाली अन्य विशाल प्रणालियों जैसी सार्वजनिक पहचान इसे नहीं मिली।
हाल के अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि यह प्रणाली कमजोर पड़ रही है। यदि इसकी गति और धीमी होती है तो दुनिया के लगातार गर्म होने के बावजूद उत्तरी यूरोप में सर्दियां कहीं अधिक ठंडी हो सकती हैं। इसके साथ ही उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की मानसून प्रणालियों में बदलाव हो सकते हैं और अमेरिका के पूर्वी तट पर समुद्र का स्तर अचानक बढ़ सकता है।
वैज्ञानिकों की लगातार चेतावनियों के बावजूद एएमओसी बिरले ही सुर्खियों में आ पाता है। इसका एक कारण मीडिया स्वामित्व और संपादकीय सीमाएं हो सकती हैं, लेकिन इसके पीछे एक और वजह भी है।
दरअसल, एएमओसी आधुनिक पत्रकारिता के सामने एक अनोखी चुनौती पेश करता है। इसे समझना ही नहीं, इसकी कल्पना करना भी कई लोगों के लिए मुश्किल है, क्योंकि यह हमारी दुनिया से बहुत नीचे, अटलांटिक महासागर की गहराइयों में धीरे-धीरे और लगभग खामोशी से संचालित होता है।
जलवायु संबंधी मुद्दों को समझने में तस्वीरें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पत्रकारिता में दशकों के दौरान एक खास दृश्य संस्कृति विकसित हुई है-जलते हुए जंगल, टूटते हिमखंड, सूर्यास्त की पृष्ठभूमि में तेल रिग, चक्रवात और प्लास्टिक की बोतलों से भरे समुद्र तट।
ये दृश्य उन जटिल प्रणालियों का प्रतीक बन जाते हैं जिन्हें सीधे देखना कठिन या लगभग असंभव होता है। जलवायु पत्रकारिता ने इसका 'विजुअल फिल्टर' नहीं बनाया।
'द ग्रेट पैसिफिक गार्बेज पैच' इसका अच्छा उदाहरण है। अक्सर समुद्र में तैरते कचरे के एक विशाल द्वीप के रूप में इसकी कल्पना की जाती है, जबकि वास्तविकता में यह लाखों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले सूक्ष्म प्लास्टिक कणों का एक बिखरा समूह है जो समुद्र की सतह से लगभग दिखाई ही नहीं देता।
फिर भी यह खबरों में बना रहता है क्योंकि कुछ ''विजुअल प्रॉक्सी'' इसे एक पहचानने योग्य रूप दे देते हैं-जैसे समुद्र से निकाली गई प्लास्टिक की बोतलें और जाल, या लंबी समुद्री यात्रा के दौरान आंकड़े जुटाने वाला कोई तैराक।
'विजुअल प्रॉक्सी' का मतलब है ऐसी दृश्य छवियां, तस्वीरें या प्रतीक जो किसी जटिल, अदृश्य या सीधे न दिखाई देने वाली चीज का प्रतिनिधित्व करें।
ये तस्वीरें 'गार्बेज पैच' को मुख्य खबरों में बनाए रखने में मदद करती हैं, भले ही वे समुद्र में वास्तव में क्या हो रहा है, उसकी तस्वीर को कुछ हद तक सरल और विकृत कर दें।
जब किसी प्रणाली की कोई तस्वीर नहीं होती
एएमओसी धीमी गति से काम करने वाली, लेकिन बेहद विशाल प्रणाली है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से गर्म सतही जल उत्तर की ओर ग्रीनलैंड तक पहुंचता है। वहां ठंडा होकर वह अधिक घना हो जाता है, लगभग 5,000 मीटर की गहराई तक डूब जाता है और फिर गहराई में दक्षिण की ओर लौटता है।
कुछ स्थानों पर यह प्रवाह सैकड़ों किलोमीटर चौड़ा होता है और पूरे अटलांटिक महासागर में गर्मी तथा लवणता के वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
समुद्री धाराओं को प्रभावित करने वाली अनेक जटिल प्रक्रियाएं इसमें शामिल हैं। इसलिए वैज्ञानिक अभी भी निश्चित रूप से नहीं जानते कि इस परिसंचरण में बदलाव कितनी तेजी से होगा या भविष्य में इसकी दिशा क्या होगी।
संभावित परिणामों को लेकर अब भी अनिश्चितता बनी हुई है। कुछ वैज्ञानिक अपेक्षाकृत आशावादी हैं, जबकि कुछ अधिक चिंतित हैं। हालांकि कई अध्ययनों में इसके कमजोर होने के संकेत मिले हैं।
फिर भी एएमओसी अपनी मौजूदगी का कोई प्रत्यक्ष दृश्य प्रमाण नहीं छोड़ता। वैज्ञानिक इसके संकेत महासागर की गहराइयों में बिखरे सुरागों से जोड़ते हैं-कभी सदियों पहले मर चुके मूंगों में संरक्षित रासायनिक अवशेषों के माध्यम से, कभी समुद्र तल पर धीरे-धीरे जमा होती तलछट की परतों में दर्ज समुद्री धाराओं के इतिहास से तो कभी गहरे समुद्र की बेहद सूक्ष्म हलचलों को रिकॉर्ड करने वाले अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से।
इन बिखरे हुए संकेतों को कंप्यूटर मॉडल की मदद से जोड़ा जाता है, जो समुद्री परिसंचरण का पुनर्निर्माण करते हैं और उसे थ्री-डी रूप में प्रदर्शित कर सकते हैं। उपग्रह भी तापमान, समुद्री सतह की ऊंचाई और लवणता से जुड़े कुछ संकेत उपलब्ध कराते हैं।
लेकिन इस शोध से प्राप्त अधिकांश सामग्री वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए तैयार की जाती है न कि समाचार कवरेज या आम लोगों की समझ के लिए।
अदृश्य को कैसे दिखाया जाए
ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि क्या एएमओसी को लोगों की नजरों में लाने के लिए और अधिक प्रभावशाली तस्वीरों की जरूरत है? और क्या ऐसी तस्वीरें वास्तव में मौजूद भी हैं?
ब्रिटेन का मौसम विभाग और नासा अक्सर अटलांटिक महासागर के चारों ओर घूमते लाल और नीले तीरों वाले आरेखों का सहारा लेते हैं।
कुछ लोगों के लिए ये प्रभावी साबित होते हैं। एएमओसी की रिपोर्टिंग करने वाली स्कॉटलैंड की पर्यावरण पत्रकार विकी एलन बताती हैं कि एक व्याख्यान के दौरान दिखाई गई स्लाइड ने पहली बार उन्हें इस खतरे की गंभीरता का वास्तविक अहसास कराया। उस चित्र में स्कॉटलैंड के ऊपर ठंडे तापमान का एक 'नीला धब्बा' उभरता दिखाया गया था और यह अनुमान पेश किया गया था कि यदि एएमओसी ध्वस्त हो जाए, तो वहां सर्दियों में तापमान शून्य से नीचे 30 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है।
लेकिन तस्वीरों का अर्थ सभी लोगों के लिए एक जैसा नहीं होता। हम अपने अनुभवों, ज्ञान और सांस्कृतिक स्मृतियों के आधार पर दुनिया को समझते हैं। एलन उसी क्षेत्र में रहती हैं जिसे उस चित्र में दिखाया गया था। दूसरे लोगों के लिए वही चित्र उतना प्रभावशाली नहीं हो सकता।
इन आरेखों के अलावा एएमओसी के पास लगभग कोई दृश्य प्रतीक नहीं है। कभी-कभी इसे "जमे हुए यूरोप" जैसी तस्वीरों के जरिए दिखाया जाता है, लेकिन अधिकांश वैज्ञानिक मानते हैं कि ऐसा विनाशकारी परिदृश्य होने की आशंका कम है।
यदि पत्रकार बार-बार 'जमे हुए यूरोप' जैसी तस्वीरों का सहारा लेते हैं, तो यह खतरा पैदा हो सकता है कि वैज्ञानिक तथ्यों को भी उन दृश्य ढांचों में ढालकर पेश किया जाने लगे, जो लोगों का ध्यान सबसे तेजी से खींचते हैं।
जब ऐसी जटिल और अदृश्य प्रणालियां मुख्यधारा की खबरों का हिस्सा बनती हैं, तो अक्सर उनकी वास्तविक कहानी से अधिक तेजी से उनकी नाटकीय तस्वीरें फैलती हैं।
लेखक बताते हैं कि उन्होंने इसका अनुभव स्वयं उस समय किया, जब वे वायुमंडल में जलकर नष्ट हो रहे उपग्रहों पर काम कर रहे थे। अंतरिक्ष यानों के आग की लपटों में घिरकर जीवनचक्र का अंत करने वाली तस्वीरें लोगों का ध्यान खींचने और विषय को समझाने में बेहद प्रभावी थीं।
लेकिन उनका वास्तविक मुद्दा कुछ और था-वायुमंडल में फैलने वाले सूक्ष्म कणों का ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले ध्रुवीय बादलों पर क्या प्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव अब भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है और इसी जटिलता को पाठकों तक पहुंचाना कहीं अधिक कठिन साबित हुआ।
असल में, गहरे महासागरों से लेकर ऊपरी वायुमंडल तक, पर्यावरण को प्रभावित करने वाली अनेक निर्णायक प्रक्रियाएं हमारी प्रत्यक्ष दृष्टि और अनुभव से परे घटित होती हैं। इनमें से कुछ बदलाव दशकों में सामने आते हैं, जबकि कुछ के प्रभावों को सामने आने में सदियां या हजारों वर्ष लग सकते हैं।
ये प्रक्रियाएं उस पृथ्वी का हिस्सा हैं, जो हमारी कल्पना और समझ से कहीं अधिक जटिल है। यहां अनिश्चितता किसी वैज्ञानिक कमजोरी का संकेत नहीं, बल्कि जलवायु तंत्र को समझने की सतत प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है।
इसके बावजूद जलवायु पत्रकारिता काफी हद तक एक सीमित दृश्य ढांचे पर निर्भर रहती है-ऐसे चित्रों पर जो नाटकीय हों, तुरंत असर डालते हों और जिनसे इंसान सीधे जुड़ाव महसूस कर सके। नतीजतन, विशाल, धीमी और जटिल पर्यावरणीय प्रक्रियाएं अक्सर ऐसी घटनाओं में बदल दी जाती हैं जिन्हें आसानी से देखा, समझा और महसूस किया जा सके।
लेकिन इस प्रक्रिया में एक जोखिम भी छिपा है। कई बार हम वास्तविक समझ के बजाय केवल लोगों का ध्यान आकर्षित करने को महत्व देने लगते हैं। एएमओसी जैसी महत्वपूर्ण प्रणालियां हमें याद दिलाती हैं कि जो चीजें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, वे जरूरी नहीं कि सबसे ज्यादा दिखाई भी दें। चुनौती विज्ञान की जटिलता नहीं, बल्कि उन दृश्य सीमाओं की है जिनके भीतर रहकर हम पर्यावरण की कहानियां दुनिया तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं।
द कन्वरसेशन खारी नरेश
नरेश
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1806 1607 डरहम