अहमदाबाद विमान हादसे की पहली बरसी: आज भी आंसुओं में छलक रहा अपनों को खोने का गम
रंजन
- 09 Jun 2026, 10:00 AM
- Updated: 10:00 AM
(कावेरी माढक)
अहमदाबाद, नौ जून (भाषा) अहमदाबाद में पिछले साल 12 जून को हुए एअर इंडिया विमान हादसे को करीब एक साल बीत चुका है और इसमें जान गंवाने वाले 260 लोगों के परिवारों का दुख आज भी उनके आंसुओं में छलक जाता है।
एअर इंडिया की उड़ान संख्या एआई 171 की दुर्घटना में अपने प्रियजनों को गंवाने वाले कुछ लोग आज भी उड़ान भरने से डरते हैं, जबकि अन्य इस गहरे सदमे से उबरने के लिए काउंसलिंग का सहारा ले रहे हैं। कई परिवारों और प्रत्यक्षदर्शियों के लिए इस त्रासदी का असर अब तक खत्म नहीं हुआ है।
दीव निवासी रफीक अरब ने पिछले साल 12 जून को लंदन जाने वाले विमान के उड़ान भरते ही हुई दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना में अपने 25 वर्षीय बेटे फैजान को खो दिया था। तब से उन्होंने आज तक किसी विमान में कदम नहीं रखा है और वह हवाई यात्रा के गहरे डर के साए में जी रहे हैं।
फैजान ब्रिटेन में इस्लामिक अध्ययन की पढ़ाई कर रहा था और दीव में अपने परिवार से मिलने के बाद वापस जा रहा था। उसका अपने पिता को आखिरी फोन संदेश था: ''पापा, मैं फ्लाइट में बैठ गया हूं और मैं जा रहा हूं।''
रफीक ने 'पीटीआई-भाषा' से कहा, ''कौन सोच सकता था कि यह उसका आखिरी मैसेज होगा? हमने उस दिन के बाद से कभी विमान यात्रा नहीं की। यहां तक कि सिर के ऊपर से गुजरने वाले विमान की आवाज भी हमें झकझोर देती है और याद दिलाती है कि कैसे 260 जिंदगियां पल भर में खत्म हो गईं।''
फैजान की मां और दो छोटे भाई अब भी उसकी कमी महसूस करते हैं। सूरत निवासी मुक्ति वांसडिया के लिए इस त्रासदी ने उनके माता-पिता दिव्या (60) और अर्जुनसिंह (65) को छीन लिया। मुक्ति ने कहा, ''मेरे माता-पिता ही मेरी रोशनी थे।''
उनके माता-पिता अपनी पहली अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर जा रहे थे और जीवन में पहली बार हवाई जहाज में बैठे थे। वे अपनी बड़ी बेटी से मिलने लंदन जा रहे थे।
मुक्ति ने याद करते हुए बताया, ''मध्यमवर्गीय लोगों के लिए विदेश यात्रा करना एक बड़ी बात होती है। वे बच्चों की तरह उत्साहित थे। मैंने उनसे कहा था कि अगर विमान में झटके महसूस हों, तो डरना मत, सब ठीक हो जाएगा।''
पहले उन्होंने एक दूसरी कनेक्टिंग उड़ान बुक की थी, लेकिन बाद में अहमदाबाद से प्रस्थान करने वाली उड़ान को चुना, ताकि बुजुर्ग दंपति गुजराती भाषी सह-यात्रियों के साथ यात्रा करने में अधिक सहज महसूस कर सकें।
रवानगी से ठीक पहले के आखिरी पल मुक्ति की यादों में दर्ज हैं। उन्होंने बताया, ''हवाई अड्डे पर, मैंने अपनी मां के पैर छुए लेकिन पिता के पैर छूना भूल गई। मैं वापस दौड़ी, उनके पैर छुए और उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई। मैं उस अहसास को कभी नहीं भूल सकती। ऐसा लग रहा था मानो वह मुझे किसी युद्ध के लिए तैयार कर रहे हों।''
इसके कुछ ही घंटों बाद, जब भाई-बहन वडोदरा में दोपहर का खाना खा रहे थे, तब एक फोन कॉल ने उनकी दुनिया हमेशा के लिए बदल दी।
अविवाहित मुक्ति अपने माता-पिता को खोने के बाद काफी संघर्ष कर रही हैं और अब सूरत में अकेली रहती हैं, जबकि उनके भाई-बहनों की शादी इस हादसे से पहले ही हो चुकी थी। इस दुर्घटना ने मुक्ति को अवसाद में धकेल दिया।
उन्होंने एक ट्रैवल एजेंसी की अपनी नौकरी छोड़ दी और महीनों काउंसलिंग में बिताए। आज, वह टाटा समूह की एक सीएसआर पहल के साथ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम करती हैं, लेकिन आज भी उनके भीतर डर गहरा बैठा हुआ है।
बनासकांठा जिले के धनेरा गांव निवासी 50 वर्षीय सावधान चौधरी के बेटे कमलेश चौधरी और बहू धापुबेन भी इस हादसे में मारे गए। दोनों की उम्र 26 वर्ष थी और हादसे से ठीक छह महीने पहले उनकी शादी हुई थी।
लंदन में बस चुके कमलेश अपनी पत्नी का वीजा मंजूर होने के बाद उन्हें साथ ले जाने के लिए भारत आए थे। सावधान चौधरी ने कहा, ''गांव के एक लड़के का विदेश में बसना बहुत बड़ी बात थी। हम सब को उस पर गर्व था।''
कमलेश ने दिवाली के बाद अपने माता-पिता को लंदन ले जाने का वादा किया था और उनके साथ उनकी सेवानिवृत्ति की योजनाओं पर भी चर्चा शुरू कर दी थी।
सावधान ने याद करते हुए कहा, ''उसने हमसे कहा था कि हम धीरे-धीरे अपने मवेशियों को बेच दें और काम करना बंद कर दें। वह अपने छोटे भाई को भी लंदन में सेटल करने में मदद करना चाहता था।''
कमलेश की मां अब एक उदासी भरे कमरे के कोने में अकेली बैठी रहती हैं। सावधान ने कहा, ''मुझे आज भी आखिरी बार उन्हें देखना याद है। वे अहमदाबाद हवाई अड्डे पर चौधरी परिवार की पारंपरिक पोशाक पहने हुए थे। भले ही वे विदेश जा रहे थे, लेकिन उन्होंने अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा था।''
इस हादसे के प्रत्यक्षदर्शी 28 वर्षीय अजय परमार की जिंदगी भी इस एक साल में पूरी तरह बदल गई है। जब विमान मेघानीनगर हॉस्टल परिसर में क्रैश हुआ, तब वह घायल हो गए थे। दोपहर के भोजन के बाद अपने दोपहिया वाहन से घर लौट रहे अजय ने अचानक खुद को इस आपदा के बीच में घिरा पाया।
उन्होंने कहा, ''मुझे अचानक एक जोरदार धमाके की आवाज सुनाई दी। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, मेरे हाथ-पैर जल रहे थे।''
उस समय माली का काम करने वाले परमार ने अपना दोपहिया वाहन वहीं छोड़ा और घबराहट में भागे। उन्होंने कहा, ''उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं है। आखिरी चीज जो मैंने देखी वह यह थी कि मेरी गाड़ी आग की लपटों में घिरी हुई थी। इसके बाद कोई मुझे सिविल अस्पताल ले गया।''
गंभीर रूप से जलने के कारण उन्हें दो महीने तक अस्पताल में इलाज कराना पड़ा। डॉक्टरों ने उन्हें सीधी धूप में काम करने से मना किया है, जिससे उनके लिए अपना पुराना काम जारी रखना असंभव हो गया है। इस वित्तीय संकट ने उनकी व्यक्तिगत समस्याओं को और बढ़ा दिया।
हादसे से महज एक महीने पहले ही उनकी शादी हुई थी, लेकिन बाद में उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर चली गईं। परमार ने दुखी होते हुए कहा, ''वह मुझे छोड़कर चली गई क्योंकि मैं काम नहीं कर सकता था और जलने के बाद मेरा हुलिया बदल गया था।''
उन्होंने कहा, ''मुझे अब भी सिर के ऊपर से गुजरने वाले विमानों से डर लगता है। मैंने उस भयावह मंजर को देखा है जहां आग के सिवाय कुछ नहीं था। कभी-कभी मैं रात में अचानक जाग जाता हूं और दोबारा सो नहीं पाता।''
भाषा वैभव रंजन
रंजन
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